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विदेशी नाम वाली देशी ब्रांड् Larsen and Toubro Limited के बारे में जानिए मजेदार फैक्ट्स.

Larsen and Toubro Limited यह नाम सुनकर आपको ऐसा लगेगा कि यह कंपनी यूएस, यूके या जर्मनी की है. मगर यह बात सुनकर आप चौक जायेंगे की (l&t) शुद्ध रूप से भारतीय कंपनी है. जैसे कि टाटा और रिलायंस है और इसका हेड क्वार्टर मुंबई में लोकेटेड है. दोस्तों आप यकीन नहीं करोगे कि दिल्ली का फेमस लोटस टेंपल, दिल्ली इंटरनेशनल एयरपोर्ट, मुंबई एयरपोर्ट आईसीसीआई बिल्डिंग, जैसे सुंदर इमारतें l&t ने ही बनाया है.

दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति जो भारत में बनी है स्टैचू ऑफ यूनिटी इसे भी l&t ने बनाया है. l&t ने भारत के विकास में अपना अमूल्य साथ दिया है जैसे कि भारत का पहले निकले समृद्धि अरिहंत मंगल यान और चंद्रयान मैं भी अपना सहयोग दिया है. आपको पता चल ही गया होगा कि भारत के लिए l&t कितने महत्वपूर्ण कंपनी है. तो दोस्तों चलिए जानते हैं यह अंग्रेजी नाम वाली कंपनी एक भारतीय कंपनी कैसे बनी.

Larsen and Toubro Limited
Larsen and Toubro Limited

Larsen and Toubro Limited

एक कंपनी जिस का ऑफिस मुंबई में था वह भी इतना छोटा कि उसमें एक आदमी और एक फर्नीचर ही आ सके. फिर दोस्तों ऐसा क्या हुआ कि इस कंपनी के पास आज 55 एकड़ जमीन है, जिसमें 100 फुटबॉल के ग्राउंड आ सकते हैं. और उसमें फिर भी थोड़ी सी जमीन बच जाएगी जिसमें आप अच्छे से क्रिकेट खेल सके. तो जानते हैं कि Larsen and Toubro Limited ने इतनी बड़ी ग्रोथ कंपनी कैसे हासिल किया. इससे आपको सीखने को जरूर कुछ मिल जाएगा.

दोस्तों l&t कंपनी की कहानी 1938 में शुरू हुई थी जब वर्ल्ड वार 2 शुरू ही होने वाला था. तब दो डेनिश इंजीनियर पुराने स्कूल दोस्त और एक ही क्लास और स्कूल में पढ़ते थे. इसका मतलब यह दोनों लंगोटिया यार थे. उन्होंने अपने फ्यूचर भारत में देखा जिनका नाम Henning Holck-Larsen and Søren Kristian Toubro.

दोस्तों कितनी अजीब सी बात है कि हम हिंदुस्तानियों को अपना फ्यूचर फॉरेन में दिखता है लेकिन इन दोनों आदमी को अपना फ्यूचर इंडिया में दिखा. लार्सन और टूब्रो भारत में इसलिए आए थे क्योंकि वह भारत में अपने देश की बनी डेहरीक्यूमेंट हमारे मार्केट में बेच सकें. और इस काम में वह सफल भी हुए थे.

पर कहानी में ट्विस्ट है जब 1939 में वर्ल्ड वार शुरू हुआ तो उस समय अंग्रेजों भारत पर राज करते थे. उन्होंने भारत में होने वाले इंपोर्ट. हर सामानों को बैन लगा दिया इससे क्या हुआ कि लार्सन और टूब्रो का डेहरीक्यूमेंट बेचने वाला बिजनेस बंद हो गया. क्योंकि वह एक्यूमेंट डेनमार्क से इंपोर्ट करते थे.

मगर दोस्तों कहानी मे एक और ट्विस्ट है जब एक दरवाजा बंद हो जाता है तो दूसरा दरवाजा भी खुल जाता है. जिस वर्ल्ड वार ने उनका बिजनेस बंद किया उसी वर्ल्ड वार ने उन्हें नया बिजनेस आइडिया दिया. दोस्तों जैसा कि आपको पता है की वर्ल्ड वार की लड़ाईयो मे शिप यानी की जहाज का भी इस्तेमाल हुआ था.

इससे लार्सन टर्बो ने शिप रिपेयर का बिजनेस स्टार्ट कर दिया और यह बिजनेस काफी जायदा सक्सेसफुल भी हुआ. 1940 में l&t कि मानो किस्मत ही बदल गई थी जब उन्होंने अपनी किस्मत आजमाई इंस्टॉलेशन फील्ड में. 1940 में l&t को बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला मिलियन डॉलर का टाटा ग्रुप से जो उस समय भारत की सबसे बड़ी कंपनी थी जिन्हें सोडा एक्सप्लेन बनवाना था अपने लिए.

उन्होंने यह प्रोजेक्ट l&t को सौंप दिया क्योंकि यह प्रोजेक्ट पहले किसी जर्मन इंजीनियर को दिया गया था लेकिन उन्होंने इस प्रोजेक्ट को छोड़ दिया वर्ल्ड वॉर 2 के कारण. क्योंकि वर्ल्ड वॉर टू में जर्मन हार गए थे वह भी बहुत बुरी तरीके से. इसीलिए अंग्रेजों ने जर्मनों को अपने देश में कैद कर दिया और इस तरह यह प्रोजेक्ट l&t को मिल गया था.

इस मौके का l&t ने बहुत अच्छे से फायदा उठाया और इस प्रोजेक्ट को l&t ने समय से पहले ही पूरा कर दिया वह भी क्वालिटी के साथ. इससे l&t के पूरे देश में वाहवाही होने लगी और उन्हें और भी प्रोजेक्ट मिलने लगे. l&t ने अपने आपको प्रूफ कर दिया था कि वह भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन सकती है.

एलएनटी कि भारत में कामयाबी देखकर विदेशी के बड़े-बड़े कंपनियां l&t के साथ काम करना चाहती थी. इसलिए 1945 में l&t ने मशीन एक्यूमेंट बनाने वाली कंपनी के साथ पार्टनरशिप कर ली. इसके साथ l&t भारत के हाइड्रोजन ऑयल बिस्किट शॉप और ग्लास बनाने लगी और इसके साथ ही l&t ने यूएस की कैटरपिलर ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी के साथ पार्टनरशिप की.

इसके साथ ही l&t भारत में अर्थ मूवीएक्यूमेंट बनाने वाली कंपनी बन गई. जिससे आप जेसीबीरिटेलर देखते हैं. 1948 जब भारत को आजाद हुए 1 साल हुआ था तब l&t ने मुंबई के पिछड़े इलाके पवई में 55 एकड़ की जमीन खरीदी और वहां पर अपने plant लगाएं जिससे कई भारतीयों को नौकरियां भी मिली.

1950 में l&t पब्लिक कंपनी बन गई जिस का पेडअप कैपिटल 2000000 का और टर्नओवर 1000 करोड़ का हुआ था. 1962 में टर्बो ने रिटायरमेंट ले लिया और 1978 में लार्सन ने और उनके कंपनी में योगदान के कारण यह भारत की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी बन गई.

l&t के करंट चेयरमैन है अनिल नानी भाई नायर इनकी चेयरमैन बनने की बड़ी ही मोटिवेटेड कहानी है उन्होंने l&t को जूनियर इंजीनियर 1965 में ज्वाइन किया था. और अपने कठिन परिश्रम के कारण उन्हें जीएम बनाया गया और फिर एमडी और सीईओ भी बनाया गया. बाद में उनके कंपनी के लिए इमानदारी और मेहनत देखकर उन्हें चेयरमैन बनाया गया.

उनके चेयरमैन बनते ही कंपनि ने नई बुलंदियों को छू लिया और उन्होंने कंपनी का विस्तार सीमेंट डिफेंस न्यूक्लियर सेक्टर में किया. l&t एक 85400 करोड़ वाली कंपनी है जिसमें 54 1000 एंप्लॉय काम करते हैं और यह कंपनी अपनी सेवा इंजीनियरिंग, फाइनेंसियल सर्विस, रियल एस्टेट में देती है. इसी कारण से l&t भारत की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी है.

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