सुभाष चंद्र बोस के बारे में रोचक तथ्य | essay on Subhash Chandra Bose in Hindi in 500 words

subhash chandra bose jayanti (जन्म) : 23 जनवरी 1897

subhash chandra bose death (मृत्यु) : 18 अगस्त 1945

सुभाष चंद्र बोस प्रारंभिक जीवन | Early Age of Subhash Chandra Bose

Subhash Chandra Bose in Hindi
Subhash Chandra Bose in Hindi

उड़ीसा के कटक में सुभाष चंद्र बोस का जन्म हुआ. उनके पिता का नाम जानकीनाथ व्यवस्था जो कि पेशे से एक वकील थे और उनकी मां का नाम प्रभावती बॉस और इसके अलावा उनकी फैमिली में 13 और भी भाई और बहन मौजूद थे और दोस्तों सुभाष चंद्र बोस शुरू से ही पढ़ाई लिखाई में दिलचस्पी रखते थे. इसीलिए स्कूल के समय से ही वह सभी टीचरों के फेवरेट थे .उन्होंने अपने शुरुआती पढ़ाई प्रोटेस्टेंट यूरोप स्कूल से पूरी की और साल 1913 में मैट्रिक में सफल होने के बाद से उनका एडमिशन प्रेसीडेंसी कॉलेज मैं करवा दिया गया.

कुछ साल के बाद 19 अट्ठारह में कुछ वर्ष बाद 19 अट्ठारह में बॉस ने यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की. हालांकि अब सुभाष चंद्र बोस देश के हित के कार्य करने में लग जाना चाहते थे’ लेकिन अपने पिता के दबाव के कारण उन्हें भारत छोड़कर इंग्लैंड जाना पड़ा क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि वह है अच्छी सी जॉब करें.

सुभाष चन्द्र बोस कैरियर | Subhas Chandra Bose Career

सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही रामकृष्ण के विचारों से काफी प्रभावित थे और इन्हीं महापुरुषों के विचारों से प्रेरित बॉस को यह लगने लगा कि उनको पढ़ाई लिखाई से ज्यादा देश के हित में काम करना जरूरी है और उस समय ब्रिटिश सरकार का शासन था जो कि भारतीयों पर जुल्म ढहाने में जरा भी पीछे नहीं रहते थे. वह अपने आसपास हो रहे जुल्फों को देख कर सुभाष चंद्र बोस के मैंने भी स्वतंत्रता की चिंगारी ने भी तेजी पकड़ ली और इनकी देशभक्ति का पहला नमूना तब देखने को मिला. जब यह अपने प्रोफेसर के द्वारा भारतीय लोगों के खिलाफ बोले जाने पर उस से लड़ गए थे.

Subhas Chandra Bose Education

कैंब्रिज में पढ़ाई पूरी करने के बाद इंडियन सिविल सर्विस एग्जामिनेशन में उन्होंने फोर्थ रैंक हासिल की. लेकिन इतनी अच्छी रैंक होने के बावजूद भी उन्होंने यह नौकरी ठुकरा दी क्योंकि उन्हें सरकार के अंदर नौकरी करना मंजूर नहीं था और फिर भारतीय लोगों के दिलों में आजादी की आशा जगाने के लिए उन्होंने एक न्यूज़ पेपर प्रिंट करना शुरू किया जिसका नाम था स्वराज और इस समय उनके मार्गदर्शन बने उस समय के एक महान नेता चितरंजन दास जो कि देश भक्ति से भरे हुए भड़काऊ भाषण देने के लिए जाने जाते थे.

फिर सुभाष चंद्र बोस के काम को देखते हुए उन्हें 1923 में ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस का प्रेसिडेंट चुन लिया गया. हालांकि स्वतंत्रता के लिए लोगों के उकसाने के अपराध में बॉस को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया और उन्हें जेल में ही उन्हें tb की बीमारी हो गई. हालांकि 1927 में एक बार जेल से रिहा होने के बाद उन्हें कांग्रेस पार्टी के जनरल सिक्योरिटी पोस्ट पर रख दिया गया. वह जवाहरलाल नेहरू के साथ आजादी की जंग में टूट पड़े और फिर 1930 में सुभाष चंद्र बोस यूरोप गए. जहां उन्होंने कुछ नेताओं से मिलकर पार्टी को और भी अच्छे से चलाने का गुण सीखा.

Subhas Chandra Bose Freedom Fighters in Hindi

इसी दौरान उन्होंने अपनी किताब द इंडियन स्ट्रगल को भी पब्लिश किया हालांकि लंदन में पब्लिश किया गया इस किताब को सरकार ने बेन कर दिया था. भारत वापस आने पर बॉस को कांग्रेस पार्टी का कांग्रेस पार्टी का प्रेसिडेंट चुना गया. हालांकि अहिंसा के रास्ते पर चढ़कर आजादी पर सोच रखने वाले गांधीजी सुभाष चंद्र जी हिंसा से भरे नीतियों पसंद नहीं करते थे और यह बात जब सुभाष चंद्र बोस को पता लगी तब उन्होंने कांग्रेश प्रेसिडेंट से इस्तीफा देना ही सही समझा. इसके बाद से सुभाष चंद्र बोस ने पूरी दुनिया में घूम घूम कर भारत के लिए समर्थन की मांग की है.

जिसकी वजह से ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ने लगा और फिर दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार चाहती थी. भारत की आर्मी भी उनके समर्थन में युद्ध लड़े लेकिन नेताजी ने इस फैसले का जमकर विरोध किया कि वे नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार की जीत के लिए भारतीय जवान अपनी जान खतरे में डालें. हालांकि इस बार फिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जेल में डाल दिया गया लेकिन जेल जाने के बाद भी वह चुप नहीं बैठे और वहीं पर भूख हड़ताल की और इसीलिए उन्हें सातवें दिन ही जेल से रिहा कर दिया गया. हालांकि जेल से छूटने के बाद सुभाष चंद्र बोस को उनके घर में सीआईडी के देखरेख में नजर बंद कर दिया गया था.

लेकिन इसके बावजूद 16 जनवरी 1941 को पठान का हुलिया बना कर सीआईडी को भी चकमा देने में कामयाब हो गए और फिर वह भारत के आजादी के लिए ब्रिटिश की दुश्मन देश जर्मनी के लिए रवाना हो गए. यहां पर हिटलर ने भारत को समर्थन देने का वादा किया मगर जब विश्व युद्ध में जर्मनी की हार होने लगी तब एक सबमरीन से सुभाष चंद्र बोस जापान चले गए. और फिर उनके मजबूत इरादों को देखते हुए उस समय जापान के प्रधानमंत्री ने भी भारत की सहयोग करने की बात की और जापान के साथ में लिखकर नेता जी ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की जिसको लोग आई एन ए इंडियन नेशनल आर्मी के नाम से जानती थे.

ऑफिस साउथ ईस्ट एशिया में रह रहे भारतीयों के सहयोग से आई एन ए की सेना में मजबूती आए. इसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बॉस ने तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा जैसे भड़काऊ किंतु उत्साहित करने वाले क्रांतिकारी नारे लगाकर भारतीय में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने की इच्छा और भी बढ़ा दी. हालांकि दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार की वजह से भारत को आर्थिक मदद और हत्या मिलने बंद हो गए और मजबूर नेता जी को भी मजबूर है इंडियन नेशनल आर्मी को बंद करना पड़ा.

achievement of Subhash Chandra Bose (उपलब्धियां)

1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। उस दौरान गांधी जी पूर्ण स्वराज की मांग से सहमत नहीं थे, वहीं सुभाष को और जवाहर लाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अन्त में यह तय किया गया कि अंग्रेज सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिये एक साल का वक्त दिया जाये। अगर एक साल में अंग्रेज सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। परन्तु अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की इसलिये 1930 में. जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ और वहां तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

Subhash Chandra Bose death (मृत्यु)

इसी तरह से देश की सेवा करते करते हैं 18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में सिर्फ 48 साल की उम्र में ही सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हो गई. परंतु उसका दुर्घटना का कोई साक्ष्य नहीं मिल सका। सुभाष चंद्र की मृत्यु आज भी विवाद का विषय है और भारतीय इतिहास सबसे बड़ा संशय है। हालांकि उनके द्वारा लगाई गई स्वतंत्रता की चिंगारी ने भारत को कुछ साल के बाद ही यानी 1947 में आजादी दिला दी.

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