चाणक्य नीति अध्याय 13 अनमोल वचन | Chanakya quotes in Hindi Chapter 13

चाणक्य नीति अध्याय 13 अनमोल वचन | Chanakya quotes in Hindi Chapter 13

चाणक्य नीति अध्याय 13 अनमोल वचन| Chanakya quotes in Hindi Chapter 13
Chanakya quotes in Hindi Chapter 13

Chanakya quotes 1

13 अध्याय की शुरुआत में श्री चाणक्य कहते हैं की उत्तम कार्य करते हुए एक पल का जीवन भी श्रेष्ठ है परंतु दोनों लोगों में दुष्कर्म करते हुए हजारों साल का जीना भी श्रेष्ठ नहीं है आगे समझाते हैं कि बीते हुए का शौक नहीं करना चाहिए और जो भविष्य में होने वाला है उसकी कभी चिंता नहीं करनी चाहिए आए हुए समय को देखकर ही विद्वान लोग किसी भी कार्य मैं लगते हैं इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो वर्तमान के संबंध में ही सोच विचार कर कार्य करते हैं अर्थात जो वर्तमान में जीते हैं भूत और भविष्य की चिंता नहीं करते हैं उत्तम स्वभाव से ही देवता सज्जन और पिता संतुष्ट होते हैं बंधु बांधव खानपान से और श्रेष्ठ वार्तालाप से पंडित अर्थात विद्वान प्रसन्न होते हैं मनुष्य को अपने मधुर स्वभाव को बनाए रखना चाहिए

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आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में समझाया है कि जो व्यक्ति जैसे प्रसन्न हो उसे वैसे ही प्रसन्न करना चाहिए आगे कहते हैं कि बड़ों का स्वभाव विचित्र होते हैं मैं लक्ष्मी की तृष्णा के समान समझते हैं और उनके प्राप्त होने पर उनके भार से और भी अधिक नरम हो जाते हैं भाव यह है कि जो महान है वह धन के महत्व को कुछ नहीं समझते उनका स्नेह स्वभाव धन से भी अधिक ऊंचा होता है आगे बहुत ही अच्छी बात समझाई है जिसे हर व्यक्ति को समझना चाहिए आज के समय में कोई व्यक्ति किसी से लगाओ लगा लेते हैं

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श्री चाणक्य कहते हैं कि जिसे किसी से लगाव है वह उतना ही भयभीत होता है लगाओ दुख का कारण है दुखों की जड़ लगाव है अतः लगाव को छोड़कर सुख से रहना सीखो आगे समझाते हैं कि भविष्य में आने वाले संभावित परिस्थिति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज देते हैं वह सदा सुखी रहते हैं इसके अलावा जो ऐसा सोचते हैं कि इसके अलावा वैसा होगा तथा जो होगा वह देखा जाएगा और कुछ उपाय नहीं करते वैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं.

यहां से चाणक्य कर्म को करने और भगवान के भरोसे ना बैठे रहने की बात कही है उनके कहने का भाव यह है कि केवल भाग्य के भरोसे ही नहीं बैठे रहना चाहिए विपत्ति आने पर या उसके आने की संभावना होने पर तत्काल उपाय कर लेना चाहिए जो व्यक्ति विपत्ति को भगवान की ओर से रचा गया भाग्य कहकर उसे समाप्त करने का उपाय नहीं करते वह नष्ट हो जाते हैं

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चाणक्य आगे कहते हैं कि जैसा राजा होता है उसकी प्रजा भी ऐसी होती है ध धर्मात्मा राजा के राज्य की की प्रजा धर्मात्मा पापी की राज्य की पापी और मध्यमवर्गीय राज्य की प्रजा मध्यम अर्थात राजा का अनुसरण करने वाली होती है आगे समझाते हैं कि धर्म से विमुख व्यक्ति जीवित भी मृतक के समान होता है परंतु धर्म के आचरण करने वाले व्यक्ति चिरंजीवी होते हैं धर्म अर्थ और काम और मोक्ष इन चारों का सम्मान लोक और परलोक दोनों से है मनुष्य को अपना जीवन सार्थक करने के लिए इनमें से किसी एक को अवश्य ही पाना चाहिए.

आगे बहुत ही अच्छी बात समझाते हैं कि नीच मनुष्य दूसरे की यशस्वी अग्नि की तेजी से जलते रहते हैं और उस स्थान पर ना पहुंचने के कारण उनकी निंदा करते रहते हैं दूसरों की निंदा सदैव दुष्ट व्यक्ति ही किया करते हैं वह दूसरे के यश को देख कर सदैव ईर्ष्या में जलते रहते हैं आगे समझाते हैं कि मन को विषयहीन अर्थात मोह माया युक्त करके ही मोक्ष से प्राप्त हो सकती है क्योंकि मन में विषय वासनाओं के आगमन के कारण ही मनुष्य मोह माया के जाल में आसक्त होकर रह जाता है अतः हर मनुष्य को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए

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चाणक्य कहते हैं कि मन की इच्छा के अनुसार सारे सुख किस को मिलते हैं अर्थात किसी को नहीं मिलते इससे यह सिद्ध होता है कि देव के ही वश में सब कुछ है अतः संतोष का ही आश्रय लेना चाहिए आगे चाणक्य जीवन की बहुत ही अच्छी बात समझा रहे हैं जैसे हजारों गाय के मध्य बीच बछड़ा अपने माता के पास आ जाता है उसी प्रकार किए गए कर्म करता के पीछे पीछे आ जाते हैं.

मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे फल भी उसके कर्म के अनुसार ही मिलते हैं अतः सदैव अच्छे कर्म करके ही अपना जीवन सुधारना चाहिए कहते हैं कि अवस्थित कार्य करने वालों को समाज में और ना ही वन में सुख प्राप्त होता है क्योंकि समाज में लोग उसे भला-बुरा कहकर जलाते हैं और निर्जन वन में अकेला होने के कारण वह दुखी होता है भाव यह है कि ऐसे व्यक्ति को ना तो घर में सुख मिलता है और ना ही सन्यास लेने पर सुख प्राप्त होता है

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जिस प्रकार फावड़े अथवा कुदाल से खोदकर व्यक्ति धरती के नीचे से जल प्राप्त कर लेता है इसी प्रकार शिष्य गुरु की सेवा करके ही विद्या प्राप्त कर लेता है फल कर्म के अधीन है बुद्धि कर्म के अनुसार होती है तब भी बुद्धिमान लोग और महान लोग सोच विचार करते ही कोई कार्य करते हैं किसी भी कार्य को करने से पूर्व उसी प्रकार से सोच समझ लेना चाहिए तभी कार्य अच्छे से होते हैं.

आगे समझाते हैं कि अपनी स्त्री भोजन धन इन तीनों में संतोष करना चाहिए और विद्या पढ़ने जप करने और दान देने इन तीनों में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए बड़े लोगों के सम्मुख कितनी भी बड़ी परिस्थितियों क्यों ना आ जाए वह अपने लक्ष्य से कभी भी विचलित नहीं होते जो सोच लेते हैं उसे करके ही हटते हैं वह कभी अपने मान्यताओं अपने सिद्धांतों अपने आदर्शों और अपने उद्देश्य से कभी भी पीछे नहीं हटते आप भी अपने उद्देश्य से कभी पीछे मत हटाइए यह समाप्त होती है 13 अध्याय की.

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